यशस्वी जब 2012 में मुंबई आए तो रहने के लिए उनके पास जगह नहीं था। एक डेयरी दुकान के बाहर सोने पर उन्हें वहां से जबरन हटाया गया था। इसके बाद आजाद मैदान में मुस्लिम यूनाइटेड क्लब के तम्बू में ग्राउंड्समैन ने यशस्वी को जगह दी।
ईएसपीएन क्रिकइंफो से बात करते हुए उन्होंने कहा, "मैं बस क्रिकेट खेलना चाहता हूं और मुंबई के लिए खेलना चाहता हूं। मुझे तम्बू में रहने में कोई परेशानी नहीं होती थी। हालांकि, वहां बिजली, शौचालय और पानी की सुविधा नहीं थी। पैसे के लिए मैंने एक खाने की दुकान पर काम करना शुरू कर दिया। आगे बढ़ने के लिए ऐसा करना जरूरी था।"
यशस्वी के कोच ज्वाला सिंह ने जब पहली बार उन्हें नेट पर देखा तो सबकुछ बदल गया। अवसर की कमी के कारण वे खेल छोड़ने वाले थे, लेकिन ज्वाला ने उन्हें आगे बढ़ाने का फैसला किया। यशस्वी उन्हीं के साथ रहने लगे। ज्वाला ने कहा, "वह 11-12 साल का था, जब मैंने उसे पहली बार देखा। उसके प्रदर्शन से प्रभावित हुआ। वह ए डिवीजन के गेंदबाजों को आराम से खेल रहा था।"
यशस्वी का नाम लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड में दर्ज है। उन्होंने एक स्कूल क्रिकेट मैच में नाबाद 319 रन बनाए और गेंदबाजी में दोनों पारियों को मिलाकर 99 रन पर 13 विकेट लिए। स्कूल क्रिकेट में सबसे ज्यादा रन और विकेट का यह एक रिकॉर्ड है। अंडर-19 टीम में चयन से पहले उन्हें मुंबई के अंडर-16 टीम में शामिल किया गया था।
यशस्वी के कोच ने कहा, "पिछले तीन साल में उसने 51 शतक लगाने के साथ-साथ 200 विकेट भी लिए। उसे बड़े स्कोर बनाने की आदत है। अगर वह इसी तरह बड़े टूर्नामेंट में रन बनाते रहा तो एक दिन भारत के लिए जरूर खेलेगा।" एशिया कप फाइनल में यशस्वी ने 113 गेंद पर 85 रन बनाए।देश को आजाद हुए करीब 15 साल हो गए थे और पंडित जवाहरलाल नेहरू को प्रधानमंत्री बने भी। मगर 1962 आते-आते नेहरू की आभा तो बरकरार थी, लेकिन कांग्रेस को लेकर कहीं-कहीं रोष भी था। इस तरह तीसरा आम चुनाव कई मायनों में खास रहा। वैसे यह चुनाव दो चर्चित मुकाबलों के लिए याद किया जाता है। पहला जवाहरलाल नेहरू के लोकसभा क्षेत्र फूलपुर में था। यहां उनके विरुद्घ समाजवादी डॉ. राममनोहर लोहिया चुनाव मैदान में उतरे थे। चुनाव से पहले डॉ. लोहिया ने कहा था कि मैं नेहरू के खिलाफ चुनाव सिर्फ इसलिए लड़ रहा हूं क्योंकि उन्होंने जनता को गोवा विजय (कुछ ही माह पहले गोवा को पुर्तगालियों से आजाद कराया था) की घूस दी है। यह राजनीतिक कदाचार है।
हालांकि चुनाव में नेहरू को 1 लाख 18 हजार 931 वोट मिले, जबकि डॉ. लोहिया को मात्र 54 हजार 360 वोट। समाजवादी नेता रघु ठाकुर कहते हैं कि 1962 का चुनाव लड़ने से पहले इलाहाबाद में डॉ. लोहिया की बड़ी आमसभा हुई। उसी सभा में किसी युवक ने उन्हें नेहरू के खिलाफ चुनाव लड़ने की सलाह दी थी। जब डॉ. लोहिया का चुनाव लड़ना तय हुआ तो पंडित नेहरू ने उन्हें पत्र लिखा (यह पत्र रघु ठाकुर के पास अभी भी है) कि अगर आप चुनाव लड़ोगे तो मैं चुनाव प्रचार नहीं करूंगा। मगर इस विशाल जीत के लिए नेहरू को तीन सभाएं करनी पड़ीं। हालांकि बाद में लोहिया 1963 में एक उपचुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे। दूसरा चर्चित मुकाबला नॉर्थ बॉम्बे सीट पर हुआ, जहां कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष जेबी कृपलानी अपनी ही पार्टी के नेता और रक्षा मंत्री कृष्णा मेनन के खिलाफ खड़े हो गए थे। वजह थी लद्दाख के हिस्से वाले अक्साई चिन पर चीन का कब्जा। हालांकि कृपलानी एक लाख 45 हजार से अधिक वोटों से चुनाव हार गए।
- चुनाव आयोग ने पहली बार मतदान केंद्रों पर उम्मीदवारों के अलग-अलग पर्चे रखवाना बंद कर एक ही पर्चे पर सभी प्रत्याशियों के नाम और चुनाव चिह्न का तरीका शुरू किया। यह देश में ईवीएम के आने के पहले तक लगातार जारी रहा।
- शशि शर्मा की किताब ‘राजनीतिक समाजशास्त्र की रूपरेखा’ के मुताबिक 1952 और 1957 के आम चुनाव में कई निर्वाचन क्षेत्र द्विस्तरीय थे। यानी एक निर्वाचन क्षेत्र से दो उम्मीदवार चुनकर आते थे। इस कारण बड़ी संख्या में मत अवैध घोषित हो जाते थे। इसके बाद 1962 के चुनावों से सभी निर्वाचन क्षेत्रों से एक ही उम्मीदवार निर्वाचित होने लगा।
- मूंदड़ा कांड आजादी के बाद भ्रष्टाचार का बड़ा मामला था। इसे उठाने वाले कांग्रेस के ही फिरोज गांधी थे। मूंदड़ा कांड का जिम्मेदार तत्कालीन वित्तमंत्री टीटी कृष्णामाचारी को माना गया। उन्होंने इस्तीफा भी दिया। लेकिन 1962 में मद्रास प्रांत की तिरुचेंदुर सीट से निर्विरोध जीतकर लोकसभा पहुंच गए।
- पंजाब में क्षेत्रीय दल शिरोमणी अकाली दल ने 3, मद्रास प्रांत में डीएमके ने 7, केरल में मुस्लिम लीग ने 2 सीटें जीतीं। राम राज्य परिषद ने 2, गणतंत्र परिषद ने उडीसा में 2, हरियाणा लोक समिति ने 1 और हिंदू महासभा ने एक सीट जीती।