Friday, August 31, 2018

नज़रियाः राहुल गांधी की चुनौती जितनी संघ को, उतनी ही कांग्रेस को

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को मुस्लिम ब्रदरहुड के साथ की गई अपनी तुलना सख्त नागवार गुजरी है. इस्लाम या मुसलमान से जुड़ी किसी भी वस्तु या अवधारणा का जिक्र अपने साथ करने का ख्याल भी संघ और उनके समर्थकों के लिए अकल्पनीय है.
इसलिए फौरन संघ और भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने राहुल की भर्त्सना कहते हुए कहा कि राहुल चूँकि भारत को नहीं जानते, वो संघ को भी नहीं जान सकते.
राहुल गांधी की जो बात संघ को चुभ गई, वह कुछ यों थी: अरब में जो मुस्लिम ब्रदरहुड है, वही भारत में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है. दोनों में समानता है, यह बताने के लिए राहुल गांधी ने तीन तथ्य रखे. दोनों पिछली सदी के तीसरे दशक में वजूद में आई, दोनों पर अपने देशों के राष्ट्रीय नेताओं की हत्या के बाद प्रतिबन्ध लगा और दोनों में ही औरतों का प्रवेश निषिद्ध है.
तुलना हमेशा सीमित होती है लेकिन वह इसलिए नहीं की जाती कि यह बताया जाए कि एक बिलकुल दूसरे की तरह है. दोनों का रुझान एक है या स्वभाव समान है, यह बताना ही तुलना का मकसद है.
मुस्लिम ब्रदरहुड नाम से ही साफ़ है कि वह मुसलमानों के भाईचारे की बुनियाद पर टिका है और उसे मजबूत करना उसका मकसद है. इसके साथ ही इस्लाम को वह समाज और राज्य के संगठन की बुनियाद मानता है.
यही बात कुछ संघ के बारे में कही जा सकती है. वह हिन्दुओं के बीच बंधुत्व बढ़ाने और उनका संगठन मजबूत करने के उद्देश्य से गठित और परिचालित है. "संगठन में शक्ति है", यह संघ का प्रिय मंत्र है लेकिन इसमें जो अनकहा है, वह यह कि संगठन हिंदुओं का होना है.
अटल बिहारी वाजपेयी ने भी कहा था कि संघ हिन्दुओं को एकजुट करने का काम करता है. उनके मुताबिक़, "संघ के समक्ष दो काम हैं. एक हिन्दुओं को संगठित करना. एक मजबूत हिंदू समाज का निर्माण, सुगठित और जाति तथा अन्य कृत्रिम विभेदों से परे." क्या जातिविहीन, आत्मसम्मान युक्त समाज के गठन पर किसी को ऐतराज होना चाहिए?
अपना काम संघ अनेक संगठनों के जाल के जरिए करता है जो समाज के अलग-अलग तबकों में शिक्षा और सेवा के नाम पर सक्रिय हैं. यही मुस्लिम ब्रदरहुड भी करता है, शिक्षा, स्वास्थ्य और दूसरे कई क्षेत्रों में वह अनेक रूपों में सक्रिय है. हमास के काम का तरीका भी यही है और पाकिस्तान में जमात उल दावा भी इसी तरह काम करता है.
सारे संगठन जो किसी एक विचारधारा से परिचालित हैं, वे रूसो के इस सिद्धांत को जानते हैं कि ताकत के मुकाबले अधिक कारगर तरीका है लोगों की भावनाओं को अनुकूलित करके वर्चस्व स्थापित करना. ऐसा करके ये संगठन अपना एक व्यापक जनाधार बनाते हैं. वह उनके लिए खड़ा हो जाता है. मसलन हमास के चरमपंथी तरीकों के कारण उस पर जब भी फंदा कसेगा, उसके सामजिक कार्यों से लाभान्वित जनता उसके पक्ष में खड़ी हो जाएगी.
ब्रदरहुड हालाँकि पैदा मिस्र में हुआ लेकिन चूँकि इस्लाम दूसरे देशों में भी है, उसके प्रति आकर्षण तुर्की, ट्यूनीशिया,फिलस्तीन, कुवैत, जॉर्डन, बहरीन जैसे देशों में भी है और उसकी तरह के राजनीतिक दल वहाँ भी हैं.
संघ का दूसरा दायित्व उनके मुताबिक़ मुख्य रूप से अन्य धर्मावलम्बियों को मुख्य धारा में समाहित करना है. यह उन्हें संस्कार देकर किया जाना है.
संघ मुसलमानों और ईसाईयों को कैसे संस्कार देता है, या संस्कारित करता है, यह वे ही जानते हैं. पिछले चार सालों से जिस तरह उनका संस्कार किया जा रहा है, अगर वह जारी रहा तो राहुल गांधी की चेतावनी हकीकत में बदल जाएगी. यानी भारत पूरी तरह बदल जाएगा.
ब्रदरहुड और संघ में समानता का एक आधार पश्चिम में पैदा हुए विचारों से उनकी घृणा है. ब्रदरहुड उसे मुसलमानों को भ्रष्ट करने वाला मानता है. संघ भी शुद्ध भारतीय चिंतन और संस्कृति पर जोर देता है. पश्चिम की टेकनोलॉजी से इन दोनों को कोई परेशानी नहीं क्योंकि वह इन शुद्ध विचारों को प्रसारित करने का माध्यम भर है.
जवाहरलाल नेहरू के बाद राहुल पहले कांग्रेसी नेता हैं जो संघ को भारत के लिए सबसे बड़ा ख़तरा बता रहे हैं. बीच में जनता पार्टी के सरकार के वक्त संघ की सदस्यता को जॉर्ज फर्नांडीस और उनेक दूसरे समाजवादी साथियों ने अस्वीकार्य बताया था और इसी के चलते जनता पार्टी टूट गई थी.
जन संघ जिसने खुद जो जनता पार्टी में विलीन कर दिया था, अलग हो गया क्योंकि उसकी पहली और अंतिम प्रतिबद्धता संघ से थी. बाद में वही भारतीय जनता पार्टी के नाम से अवतरित हुआ.
नेहरू संघ को भारत के विचार के लिए ख़तरा मानते थे. इसलिए संघ और जन संघ दोनों से वे लोगों को सावधान करते रहे. कांग्रेस में जो एक हिंदू मन पहले से सक्रिय था, जिसके प्रतिनिधि राजेंद्र प्रसाद, गोविंद वल्लभ पंत, सरदार पटेल, पुरुषोत्तम दास टंडन, रवि शंकर शुक्ल जैसे लोग थे. इन्हें संघ से विशेष परेशानी न थी.
5 दिसंबर, 1947 को लखनऊ से एक ख़त में इंदिरा गांधी संघ के बढ़ते प्रभाव के नेहरू को सावधान करते हुए लिखती हैं. जिसमें संघ की एक रैली का वे विस्तार से वर्णन करती हैं. वे जर्मनी के 'ब्राउन शर्ट' की लोकप्रियता का जिक्र करके कहती हैं, "जर्मनी का हालिया इतिहास हमारे इतना क़रीब है कि एक क्षण के लिए भी उसे भूलना कठिन है. क्या हम भारत के लिए उसी भाग्य को न्योता दे रहे हैं?"
इसके बाद इंदिरा यह कहती हैं कि "कांग्रेस का संगठन पहले ही इसके कब्जे में आ चुका है. ज़्यादातर कांग्रेसी ऐसी प्रवृत्तियों का समर्थन करते हैं. वाही हाल हर ओहदे पर बैठे सरकारी अधिकारियों का है."

Wednesday, August 29, 2018

ये गिरफ़्तारियां संविधान के ख़िलाफ़ तख्तापलट है: अरुंधति रॉय

मंगलवार को पुणे पुलिस ने देश के अलग-अलग हिस्सों में कई छापे मारे और महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव में हुई हिंसा की जांच का हिस्सा बताते हुए कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार कर लिया.
इस साल जनवरी में भीमा कोरेगांव में दलितों का प्रदर्शन हुआ था. इसमें हिंसा होने की भी ख़बरें आई थीं.
पुलिस अधिकारियों ने बीबीसी को बताया है कि दिल्ली, मुंबई, राँची, हैदराबाद और फ़रीदाबाद समेत कई जगहों पर छापे मारे गए हैं.
इसमें भारत के पांच प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार और कवि गिरफ़्तार किए गए हैं.
इनमें सुधा भारद्वाज, गौतम नवलखा, वरवर राव, वरनॉन गोंज़ाल्विस और अरुण फ़रेरा शामिल हैं. पांचों को देश के अलग-अलग शहरों से गिरणे पुलिस के जॉइंट कमिश्नर (कानून-व्यवस्था) शिवाजी बोडके ने बीबीसी संवाददाता विनीत खरे को बताया, "कोरेगांव में जो हिंसा हुई उसे नक्सलवादियों का समर्थन हासिल था. ये लोग माओवादी गतिविधियों में शामिल थे. माओवादी हिंसा के पीछे इन लोगों का हाथ था. पुलिस इन लोगों को पुणे लाने की कोशिश कर रही है. इस मामले में चार्जशीट कब दायर की जाएगी इसके बारे में बाद में जानकारी दी जाएगी."
पुलिस की इस कार्यवाई की चौतरफ़ा आलोचना की जा रही है. मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने कहा है कि सरकार को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करनी चाहिए.
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने ट्वीट कर तंज कसा, "भारत में सिर्फ़ एक ही एनजीओ की जगह है और वो है आरएसएस. नए भारत में आपका स्वागत."
इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने ट्विटर पर लिखा कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट को जल्द से जल्द दख़ल देना चाहिए.
वरिष्ठ वक़ील प्रशांत भूषण का कहना है कि फ़ासीवादी शक्तियाँ अब खुलकर सामने आ गई हैं.
इस मामले में बीबीसी ने जानी मानी लेखिका अरुंधति रॉय, नक्सलवादी इलाक़ों में पत्रकारिता कर चुके राहुल पंडिता और पीयूसीएल की सचिव कविता श्रीवास्तव से बात की. श भर में एक साथ हो रही ये गिरफ़्तारियां एक ख़तरनाक संकेत हैं. ये सरकार के डर को दिखाती हैं. इससे पता चलता है कि सरकार को यह डर सता रहा है कि लोग उसका साथ छोड़ रहे हैं और इसलिए वो घबरा गई है.
आज देश भर में वक़ीलों, कवियों, लेखकों, दलित अधिकार कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों पर उटपटांग आरोप लगाकर उन्हें गिरफ़्तार किया जा रहा है. वहीं, दूसरी तरफ़ मॉब लिंचिंग करने, धमकी देने और लोगों को दिनदहाड़े हत्या करने की धमकी देने वाले खुले घूम रहे हैं.
ये चीज़ें बताती हैं कि भारत किधर जा रहा है. हत्यारों का सम्मान किया जा रहा है, उन्हें सुरक्षा दी जा रही है.
जो भी इंसाफ़ के लिए या हिंदू बहुसंख्यकवाद के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाता है, उसे अपराधी बता दिया जाता है. जो कुछ भी हो रहा है वो बेहद ख़तरनाक है.
चुनाव से पहले ये उस आज़ादी और भारतीय संविधान के ख़िलाफ़ तख़्तापलट की कोशिश है, जिसे हम संजोए हुए हैं.
जो कुछ हो रहा है वो संभवत: आपातकाल से भी ज़्यादा गंभीर और ख़तरनाक है. अगर हम इन गिरफ़्तारियों को लिंचिंग करने वालों और नफ़रत फैलाने वालों के साथ रखकर देखें तो ये भारतीय संविधान पर बेतहशा होने वाले वैचारिक हमले जैसा है.झे समझ नहीं आ रहा है कि इन गिरफ़्तारियों के पीछे पुलिस की क्या मंशा है. मैं तमाम लोगों को जानता हूं. माओवादी ठिकानों से मैं रिपोर्टिंग कर चुका हूं.
इन सभी लोगों से मेरी मुलाक़ात है. सुधा भारद्वाज के काम से मैं काफ़ी सालों से परिचित रहा हूं और उनकी जितनी प्रशंसा की जाए उतनी कम है.
सुधा ज़मीन पर काम करने वाली कार्यकर्ता हैं और मैं निजी तौर पर कह सकता हूं कि इनका माओवादियों से कोई संबंध नहीं है.
उनका काम है भारतीय सरकार और माओवादियों के बीच में फंसे ग़रीबों की लड़ाई लड़ना, जो जेलों में हैं और वो इतने ग़रीब हैं कि ज़मानत तक नहीं करा सकते, जिन्हें ये तक नहीं पता कि वो जेल में क्यों हैं.
मैं समझता हूं कि सरकार पर दवाब है और उसे लगता है कि अर्बन नेटवर्क को तोड़ने की ज़रूरत है. बीते कई सालों में हमने देखा है कि पुलिस सबूत पेश नहीं कर पाती है. ये कार्यकर्ता महीनों या सालों जेल में रह लेते हैं तब हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप होता है.
फ़्तार किया गया है.

Sunday, August 26, 2018

एक अमरीकी राजनेता जो वियतनाम युद्ध का हीरो था

अमरीकी सीनेटर और राष्ट्रपति पद के पूर्व उम्मीदवार जॉन मैक्केन का 81 साल की उम्र में निधन हो गया है. मैक्केन अमरीकी नौसेना के बमवर्षक विमान के पायलट, एक युद्धबंदी, सीनियर सीनेटर और राष्ट्रपति के उम्मीदवार रहे थे.
उन्हें अमरीका में किसी हीरो की तरह देखा जाता था. मैक्केन अमरीकी राज्य अरिज़ोना के प्रभावी नेता थे. उन्होंने ख़ुद को प्लेन क्रैश में बचाया था, लेकिन बीमारी से ख़ुद को नहीं बचा पाए.
मैक्केन स्किन कैंसर से पीड़ित थे. जुलाई 2017 में पता चला कि वो मस्तिष्क में ट्यूमर की समस्या से भी जूझ रहे हैं. इसके बाद उन्हें वॉशिंगटन में इलाज के लिए शिफ़्ट किया गया था.
अरिज़ोना से मैक्केन छह बार सीनेटर चुने गए. वो 2008 में रिपब्लिकन पार्टी की तरफ़ से राष्ट्रपति के उम्मीदवार भी बनाए गए. मैक्केन के पिता और दादा दोनों नेवी में ऐडमिरल थे.
वियतनाम युद्ध में वो लड़ाकू विमान के पायलट थे. इस युद्ध में मैक्केन के विमान को जब मार गिराया गया तो वो ख़ुद को बचाने में कामयाब रहे थे. वो वियतनाम में पांच सालों तक युद्धबंदी भी रहे थे. युद्धबंदी के दौरान उन्हें कई तरह की प्रताड़ना का भी सामना करना पड़ा था.
राजनीति में आने के बाद मैक्केन ने रूढ़िवादी रुख़ अपनाया. मैक्केन गर्भपात का विरोध करते थे और रक्षा पर बजट के बड़े हिस्से को खर्च करने की वकालत करते थे. मैक्केन ने 2003 में इराक़ पर अमरीकी हमले का समर्थन किया था.
सीरिया के गृह युद्ध में अमरीका के हस्तक्षेप नहीं करने पर मैक्केन ने तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा की आलोचना की थी.
हालांकि मैक्केन ने अपनी राय रखने में पार्टी लाइन की भी परवाह नहीं की. वो ट्रंप की भी ख़ूब आलोचना करते थे. मैक्केन ट्रंप की सख़्त प्रवासी नीति के ख़िलाफ़ थे.
मैक्केन का जन्म दूसरे विश्व युद्ध के ठीक पहले हुआ था और वो अमरीका के सुपरपावर बनने के दौर के साथ पले-बढ़े. वियतनाम युद्ध में लड़ने वाले मैक्केन के शरीर के कई अंगों को नुक़सान हुआ था.
इस दर्द के साथ मैक्केन जीवन भर रहे और अमरीका को भी दक्षिण एशिया के इस छोटे से देश में युद्ध को जीत नहीं पाने का दर्द भूलना पड़ा. अमरीकी राजनीति में मैक्केन का उभार तेज़ी से हुआ और इसी के दम पर रिपब्लिकन पार्टी के राष्ट्रपति उम्मीदवार भी बने. लेकिन ओबामा ने उनको पटखनी दे दी. आख़िर के दिनों में मैक्केन अंतराष्ट्रीयतावाद के समर्थक हो गए थे.
वियतनाम युद्ध नंवबर 1955 में शुरू हुआ था और यह 1975 तक चला था. 14 मार्च 1973 की वो तस्वीर आज भी याद है. वो तस्वीर थी जॉन मैक्केन की. 36 साल के मैक्केन वियतनाम में युद्धबंदी से रिहा हुआ थे.
मैक्केन की वो तस्वीर देखने के बाद यही लग रहा था कि भूख की मार से उनका शरीर बुरी तरह से टूट चुका है.
उनके जिस्म पर अस्त-व्यस्त कपड़े थे. वो बाक़ी के अमरीकी युद्धबंदियों के साथ अमरीकी सैनिकों के प्लेन में सवार होने जा रहे थे. पांच सालों तक वियताम की जेल में रहने के कारण वो दिखने में अपनी उम्र से कहीं ज़्यादा बड़े दिख रहे थे.
मैक्केन के प्लेन को जब हनोई से ज़मीन से हवा में मार करने वाली मिसाइल से मार गिराया गया था तो उनके बाल काले थे. युद्धबंदी से रिहाई के बाद उनके बाल सफ़ेद हो गए थे.
वो लंगड़ाते हुए बढ़ रहे थे. जब वियतनाम ने प्लेन पर मिसाइल दागी थी तो उस वक़्त भी उन्हें शारीरिक नुक़सान हुआ था और युद्धबंदी बनने के बाद भी उन्हें जेल में मारा-पीटा गया था.
एक महीने बाद व्हाइट हाउस में मैक्केन के स्वागत में राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने एक समारोह का आयोजन किया.
इस समारोह में मैक्केन एक बैसाखी के सहारे पहुंचे थे. मैक्केन अपने ज़ख़्म से कभी उबर नहीं पाए. वो जीवन भर अपने हाथ सिर से ऊपर ले जाने में असमर्थ रहे. में राष्ट्रपति के चुनावी कैंपेन का एक वाक़या मैक्केन के राजनीतिक सलाहकार ने बताया था. मैक्केन न्यू हैंपशर में एक रैली से पहले अपनी गाड़ी के पीछे इंतजार कर रहे थे. उन्होंने मैक्केन के बाल में कंघी की थी.
मैक्केन कंघी के बाद भीड़ की तरफ़ बढ़े तो रोने लगे थे. वियतनाम से लौटने के बाद भी मैक्केन आठ सालों तक सेना में रहे. मैक्केन ने अपने परिवार से सेना में जाने की परंपरा को जारी रखा था. जॉन मैक्केन कई बार वियतनाम भी गए.

Friday, August 17, 2018

बुंदेलखंड: यहाँ गाय बन गई है किसानों के लिए आफ़त

अगस्त के दूसरे हफ़्ते में बांदा के नरैनी ब्लॉक के कालिंजर निवासी दादू और प्रदीप कुमार की 'अन्ना पशुओं' को बचाने के चक्कर में जान चली गई.
कालिंजर थाने के कोतवाल राकेश सरोज बताते हैं कि वे दोनों नरैनी सीएचसी से बाइक से गांव जा रहे थे.
"कालिंजर रोड पर शंकर का पुरवा गांव के पास अन्ना पशुओं को बचाने के लिए दाएं तरफ मुड़े तभी पीछे से आ रही बस ने टक्कर मार दी. दोनों की मौके पर ही मौत हो गई."
"अन्ना पशुओं के कारण आए दिन हादसे होते रहते हैं. लाश का पोस्टमार्टम करा कर घर वालों को सौंप दिया गया."
बुंदेलखंड में कई किसान पशुओं को पास के जंगल में छोड़ आते हैं, इन पशुओं को 'अन्ना पशु' कहा जाता है.
कुछ ऐसी की कहानी रामबख़्श के परिवार की भी है. इसी साल पहली जनवरी की तारीख थी.
झांसी ज़िले के मउरानीपुर ब्लॉक के धवाकर गाँव के रहने वाले 64 साल के रामबख़्श यादव कड़ाके की ठंड में खेत में काम कर रहे थे.
तभी अन्ना पशुओं के एक झुँड ने फसलों पर धावा बोल दिया. फसल बचाने के लिए रामबख़्श पशुओं को भगाने लगे और अन्ना पशुओं ने रामबख़्श पर हमला कर दिया.
घायल रामबख़्श की अस्पताल पहुँचने से पहले ही मौत हो गई. रामबख़्श की पत्नी और 3 बच्चे आज भी उस घटना को याद करके सहम जाते हैं.
इस घटना को लेकर काफ़ी विरोध प्रदर्शन हुए. राज्य सरकार ने माना कि रामबख़्श की मौत अन्ना पशुओं के कारण हुई. सरकार ने उनके परिवार को मुआवज़ा भी दिया.
बुंदेलखंड में आए दिन ऐसी घटनाएँ अख़बारों की सुर्खियाँ बनती हैं. किसानों के लिए अन्ना पशु अब आफ़त बनते जा रहे हैं. बुंदेलखंड में लाखों की संख्या में अन्ना पशु हैं.
ये फसलों को बर्बाद कर देते हैं. सड़कों पर आकर दुर्घटनाओं का कारण बनते हैं.
बुंदेलखंड के किसान नेता शिव नारायण सिंह परिहार कहते हैं कि बुन्देलखंड में 'अन्ना प्रथा' अब किसी आफ़त से कम नहीं रह गई है.
वो कहते हैं, "झांसी-कानपुर नेशनल हाइवे, झांसी-इलाहाबाद नेशनल हाइवे, झांसी-शिवपुरी नेशनल हाइवे पर आए दिन अन्ना पशुओं के कारण दुर्घटनाएं होती रहती हैं."
अन्ना पशुओं के कारण किसानों के बीच लड़ाई-झगड़े भी यहां आम बात है.
अन्ना प्रथा कैसे शुरू हुई इस बारे में महोबा के ककरबई के किसान राजेंद्र कुमार बताते हैं कि पहले हमारे गाँव से लगा हुआ एक छोटा सा जंगल था.
"आसपास के जितने भी गाँववाले थे, वो सभी इसी जंगल में पशुओं को छोड़ जाते थे. अब जंगल ख़त्म हो चुके हैं लेकिन किसानों की आदत नहीं छूटी है."
"हालत ये है कि किसान आज भी पशुओं को खुला छोड़ देते हैं और यह पशु खेतों में खड़ी फसलों को बर्बाद करते हैं."
झांसी के मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी डॉक्टर वाईएस तोमर की मानें तो बुंदेलखंड के सूखे और पलायन की समस्या ने यहाँ अन्ना प्रथा को जन्म दिया है.
तोमर कहते हैं, "ये प्रथा कई वर्षों से चली आ रही है. इस प्रथा में गाय, बैल व भैंस आदि जानवरों को भोजन की तलाश के लिए खुला छोड़ दिया जाता है."
"किसान जानवरों को बचपन से ही इसकी आदत डाल देते हैं."
बड़ागाँव के किसान रामचंद्र शुक्ल बताते हैं, "जब चैत्र के महीने में फसल कटने के बाद खेत खाली हो जाते थे, उस समय जानवरों को खुला छोड़ दिया जाता था."
"ये खेतों में बची फसलों को साफ़ कर देते थे."
वाईएस तोमर इसकी वजह सूखा, चारागाह की कमी को बताते हैं, "न ही जानवर दूध ज़्यादा देते हैं. इसलिए भी किसान जानवरों को छोड़ देते हैं."
जालौन के संजय सिंह कहते हैं कि इसके पीछे किसानों का 'कृषि ज्ञान' काम करता था.
"खुले खेतों में इन जानवरों के विचरण करने और चरने से उन्हें अपने खेत की उर्वरा शक्ति बढ़ाने में भी मदद मिलती थी."
"खेत में इन जानवरों का गोमूत्र और गोबर खाद का काम करता था. लेकिन, सूखे व पलायन के कारण हालात बदल गए हैं."

Wednesday, August 15, 2018

克里斯蒂安娜·菲格雷斯竞选联合国秘书长

联合国气候事物主管克里斯蒂安娜·菲格雷斯宣布,她将参加下一任联合国秘书长的竞选。

曾推动各方去年在巴黎达成了具有历史意义的气候变化公约的菲格雷斯已于今年7月1日
卸任UNFCCC执行秘书一职。今天,她正式宣布有意接替潘基文担任联合国秘书长一职。

潘基文将于今年十二月结束任期,到目前为止已有11位候选人公开表示有意接替他的职务。据称,菲格雷斯已经与外交人士、资金提供方和联合利华、宜家等在兑现巴黎协定承诺中发挥重要作用的大型企业的CEO进行了接触。

许多人认为,如果菲格雷斯参选,她将成为此次选举中的一匹黑马。菲格雷斯生于哥斯达黎加政治世家——她的父亲何塞·菲格雷斯·费勒曾三次当选哥斯达黎加总统——虽然她长期从事外交工作,但缺少传统上联合国秘书长通常具有的国家安全方面的资历,并且在人道主义救援和维和等其他联合国的重点工作领域也存在欠缺。

但支持者认为,菲格雷斯作为联合国近期最成功的项目的代言人,将会为联合国秘书长职位带来新的活力和能量。而且,人们也寄希望于她能够在全球范围内重点推动《巴黎协定》的落实。

“传统上对候选人维和与安全事务资质的关注是旧时代的遗产,而联合国秘书长的工作范围每年都在扩充,其职位的内涵需要得到拓展。”联合国副秘书长、潘基文气候变化问题特别顾问罗伯特·奥尔表示。

奥尔认为,菲格雷斯的参与对于此次竞选将是“大有裨益的”,因为这样一来,气候变化将成为候选人面试和评定的“重要问题”之一。“在此之前,联合国秘书长的竞选中几乎没有任何有关气候变化问题的内容。”他说。

潘基文气候变化问题高级顾问亚诺斯·帕斯多表示,下一任秘书长将全球变暖作为其首要工作至关重要。

“联合国秘书长可以定期提醒各国政府和非国家行为体领导人落实巴黎协定,调动联合国各有关机构支持成员国落实巴黎协定,可以反复向世界强调采取行动应对气候变化的重要性和急迫性。如果下一任秘书长不将气候变化摆在其工作的首要位置,那么世界将失去这样的一位领袖,”他表示。

潘基文继任者的选择目前已经向全球安全事务倾斜。联合国安理会将向联合国大会推荐人选,由联合国大会进行筛选。最终人选预计将于十月确定。

今年的秘书长选举被誉为联合国史上最为公开和民主的一次选举,但是安理会对选举流程仍然有着巨大的影响。任何成功的候选人必须获得俄罗斯、英国、法国、中国和美国这五个常任理事国的支持。

 
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有官员表示,新落成的宁夏韦州清真大寺没有获得适当的建筑许可证。
但信众拒绝退缩, 一位居民表示他们“不会让政府碰清真寺”。
中国是大约2300万穆斯林的家园,几个世纪以来,伊斯兰教在宁夏一带占据主导地位。
但人权组织表示,中国官方对待穆斯林的敌对情绪越来越多,特别是有外国宗教影响的情况下。
面临被拆毁风险的这座清真寺以中东风格建造,有九个洋葱头形状的圆顶、伊斯兰特有的星月标志以及四座用于穆斯林祷告的尖塔。
有媒体报道称,北京将此视为中国穆斯林人群伊斯兰化和阿拉伯化的代表,对这种趋势感到非常担心,同时正采取手段使这些宗教走向“中国化”。