Wednesday, September 26, 2018

चौकसी के प्रत्यर्पण में मदद करेगा एंटीगुआ, विदेश मंत्री ग्रीन का सुषमा स्वराज से वादा

न्यूयॉर्क. पीएनबी घोटाले के आरोपी मेहुल चौकसी की मुश्किल और बढ़ सकती है। गुरुवार को विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने संयुक्त राष्ट्र में एंटीगुआ और बारबुडा के विदेश मंत्री ईपी चेत ग्रीन से चौकसी के प्रत्यर्पण को लेकर बात की। ग्रीन ने भरोसा दिलाया कि वे हरसंभव मदद करेंगे। चौकसी इस समय एंटीगुआ में ही है।

एंटीगुआ को दी घोटाले की जानकारी

  1. न्यूज एजेंसी ने विदेश मंत्रालय के सूत्रों के हवाले से बताया, ग्रीन को सुषमा स्वराज यह समझाने में कामयाब रहीं कि चौकसी भारत में बहुत बड़ा घोटाला करके भागा है। एंटीगुआ और भारत के बीच प्रत्यर्पण संधि हो चुकी है। इसकी मदद से चौकसी को वापस लाने की कोशिश की जा रही है।
  2. चौकसी के एंटीगुआ में होने की पुष्टि के बाद भारतीय एजेंसियां उस तक पहुंचने के लिए हर विकल्प पर काम कर रही हैं। कुछ समय पहले एंटीगुआ सरकार ने बताया था कि भारत से पुलिस क्लियरेंस मिलने के बाद ही भगोड़े कारोबारी को एंटीगुआ की नागरिकता दी गई।
  3. एंटीगुआ सरकार के मुताबिक, मई 2017 में चौकसी ने नागरिकता के लिए आवेदन किया था। उसने जरूरी कागजात भी जमा किए थे। इनमें एंटीगुआ और बारबुडा सिटिजनशिप बाई इन्वेस्टमेंट एक्ट 2013 के सेक्शन 5(2)(b) के तहत जरूरी भारतीय पुलिस का क्लियरेंस सर्टिफिकेट भी शामिल था। 
  4. कई देशों के मंत्रियों से मिलीं सुषमा

    ग्रीन के अलावा सुषमा ने बोलिविया, अर्मेनिया, ऑस्ट्रिया, पनामा, जर्मनी और चिली के विदेश मंत्रियों या उनके समकक्षों से भी मुलाकात की। पाक के अनुरोध के बाद सुषमा और पाकिस्तान के विदेश मंत्री की मुलाकात तय हुई थी। जम्मू-कश्मीर में तीन पुलिसकर्मियों की हत्या के बाद यह मीटिंग रद्द कर दी गई। रीनगर. सुरक्षा बलों ने बुधवार को सोपोर में मुठभेड़ के दौरान दो आतंकियों को मार गिराया। इनमें से एक लश्कर-ए-तैयबा का टॉप कमांडर अबु माज है। माज फरवरी 2017 में आर्मी की टुकड़ी पर हुए हमले में शामिल था। इस हमले में मेजर सतीश दहिया शहीद हुए थे। मेजर दहिया सर्जिकल स्ट्राइक में भी शामिल थे। 

    12 दिन में 18 आतंकी ढेर

  5. माज के अलावा अब्दुल मजीद उर्फ समीर को भी सुरक्षा बलों ने मार गिराया। वह सोपोर के बोमई का रहने वाला था।
  6. पिछले 12 दिनों में सुरक्षा बलों की कई बार आतंकियों से मुठभेड़ हुई। इस दौरान 18 दहशतगर्द ढेर किए गए।
  7. सोपोर के तुज्जेर में आतंकियों के छिपे होने की सूचना मिली थी। इसके बाद पैरामिलिट्री फोर्स और सेना के जवानों ने एक ऑपरेशन शुरू किया। इस दौरान आतंकियों ने जवानों पर फायरिंग शुरू कर दी। जवाबी कार्रवाई में दो आतंकी मार गिराए।
  8. सेना के अफसर ने बताया कि एनकाउंटर के बाद मिले सबूतों से पता चला कि मारा गया आतंकी लश्कर का कमांडर अबु माज है। वह उत्तरी कश्मीर में 2015 से एक्टिव था और लश्कर के सबसे पुराने कमांडरों में से एक था।
  9. फरवरी 2017 में आर्मी की टुकड़ी पर हमले के दौरान अबु माज भागने में कामयाब हो गया था। उस मुठभेड़ में जवानों ने अबु साद, अबु माविया और अबु दर्डा को मार गिराया । ई दिल्ली. राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने आतंकियों को फंडिंग मुहैया कराने वाले एक टेरर मॉड्यूल का भंडाफोड़ किया है। इस सिलसिले में दिल्ली से तीन लोगों को गिरफ्तार भी किया गया। अधिकारियों के मुताबिक, पकड़े गए लोगों का संबंध आतंकी हाफिज सईद के फलाह-ए-इंसानियत फाउंडेशन (एफआईएफ) से था। एनआईए ने इस सिलसिले में मंगलवार को दिल्ली के दरियागंज, निजामुद्दीन और कूचा घासीराम में छापे मारे थे। 

    जमात-उद-दावा का विंग है फलाह-ए-इंसानियत

  10. टेरर फंडिंग मॉड्यूल की जांच के लिए एजेंसी ने इसी साल जुलाई में एक एफआईआर दर्ज की थी। इसमें कहा गया था कि दिल्ली स्थित कुछ लोग सईद के संगठन से जुड़े लोगों से पैसा ले रहे हैं और उन्हें देश में आतंक फैलाने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।
  11. जांच में सामने आया कि दिल्ली के निजामुद्दीन में रहने वाला मोहम्मद सलमान लगातार दुबई में रहकर फलाह-ए-इंसानियत के लिए काम करने वाले एक पाकिस्तानी के संपर्क में था।
  12. एनआईए की ओर से जारी बयान में कहा गया- “आरोपी एफआईएफ से जुड़े लोगों से हवाला के जरिए लंबे समय से फंड जुटा रहा था। भारत में अशांति फैलाने के लिए हाफिज के संगठन से जुड़े लोग पाकिस्तान, संयुक्त अरब अमीरात समेत कई देशों से पैसे भेज रहे हैं। उनका मकसद देश में आतंकी गतिविधियों को बढ़ावा देना है।”
  13. 1.5 करोड़ रुपए और 14 मोबाइल जब्त

    एनआईए ने 25 सितंबर को मोहम्मद सलमान के निजामुद्दीन स्थित घर, दरियागंज में रहने वाले मोहम्मद सलीम और कूचा घासीराम में रहने वाले राजाराम के घर पर छापा मारकर 1.56 करोड़ रु. की भारतीय और 43 हजार नेपाली करंसी जब्त की।
  14. इसके अलावा 14 मोबाइल फोन, 5 पेन ड्राइव और कुछ दस्तावेज भी बरामद किए गए। इस मामले में मोहम्मद सलमान, मोहम्मद सलीम के साथ जम्मू कश्मीर के रहने वाले सज्जाद अब्दुल वानी को गिरफ्तार किया।
  15. फलाह-ए-इंसानियत फाउंडेशन की स्थापना 1990 में हाफिज सईद के संगठन जमात-उद-दावा ने ही की थी। इसका मुख्यालय लाहौर में है। सईद को अमेरिका अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित कर चुका है। उस पर ईनाम भी घोषित है। खास बात ये है कि फलाह-ए-इंसानियत को भी अमेरिका ने 2010 में आतंकी संगठन घोषित कर दिया था।

Monday, September 10, 2018

नज़रिया: विज्ञान और वैज्ञानिक सोच पर हमला कर रहे हैं सरकार में बैठे लोग

17 अगस्त,  को आरबीआई के अंशकालिक निदेशक एस गुरुमूर्ति ने ट्वीट किया था, "सुप्रीम कोर्ट के जजों को देखना चाहिए कि केस (भारी बारिश के कारण केरल में आई बाढ़) और जो सबरीमाला में हुआ, उसके बीच कोई संबंध है या नहीं. अगर कोई संबंध होने का लाखों में एक चांस भी है तो लोगों को अयप्पन के ख़िलाफ़ फ़ैसला पसंद नहीं आएगा."
सोशल मीडिया पर अपने इस ट्वीट का विरोध होने के बाद उन्होंने अपने ट्वीट का बचाव करते हुए फिर से अपनी बात दोहराई थी.
दुर्भाग्य से उनका ट्वीट समाज के एक ऐसे वर्ग का एक और उदाहरण है जो धर्म और धर्म ग्रंथों की ताकत को विज्ञान और संविधान में दी गई अधिकारों की सुरक्षा की गारंटी से ऊपर मानता है.
भारतीय संविधान के मुताबिक़ 'वैज्ञानिक प्रवृत्ति, मानवता और सवाल व सुधार की भावना का विकास करना' हर नागरिक का दायित्व है. लेकिन, देश के प्रतिष्ठित व्यक्ति अपने बयानों और कामों के जरिए इस सिद्धांत का उल्लंघन कर रहे हैं. ऐसा करना न सिर्फ़ दुर्भाग्यपूर्ण है बल्कि देश के लिए नुक़सानदेह भी है.
वैज्ञानिक प्रवृत्ति रखना प्रयोगशाला में विज्ञान संबंधी प्रयोग करने जैसा नहीं है. हालांकि, प्रयोगशाला में होने वाले प्रयोग भी बहुत महत्वपूर्ण हैं और इन पर ही ध्यान सीमित करने से अच्छा शोध हो सकता है लेकिन विज्ञान और समाज में वैज्ञानिक पद्धति के सार को नहीं समझा जा सकता.
इस बात पर बहुत कम संदेह है कि वैज्ञानिक और तकनीकी विकास में लोगों के जीवन में सुधार की असाधारण क्षमता है. जैसे कि जीवन प्रत्याशा बढ़ाना और हमारी अपनी ही भौतिक दुनिया को समझने में मदद के लिए ब्रह्मांड से जुड़े सवालों के जवाब देना ताकि उनका मानव जाति के फायदे के लिए अधिकतम इस्तेमाल किया जा सके. विज्ञान ने समाज के विकास के लिए भरपूर संभावनाओं के दरवाज़े खोल दिए हैं.
मानव जाति को मुश्किलों भरी और अंधेरी ज़िंदगी से निकालने में विज्ञान की ज़बरदस्त क्षमता को नकारा नहीं जा सकता है. वहीं, एक समाज के लिए तकनीक और मशीनरी के विकास के साथ अपनी उत्पादक क्षमताओं को बढ़ाने और स्थिरता बनाए रखने के लिए आधुनिक कानूनों और मूल्यों के साथ चलना जरूरी है.
एक तकनीकी रूप से विकसित समाज पुराने सामाजिक संबंधों में लोगों को बांधने वाले पुरातन कानूनों के साथ नहीं चल सकता. ऐसे में जो समाज अभी पूरी तरह से नहीं बदला है उसकी उत्पादक क्षमताओं के विकास पर लगातार ख़तरा बना रहता है.
कई दार्शनिक मतभेदों और दृष्टिकोणों के बावजूद वैज्ञानिक पद्धति सामाजिक परिवर्तन को बल देती है. उदाहरण के लिए धार्मिक ग्रंथों में समर्थित लैंगिक और जातीय भेदभाव को बदलते समाज में विरोध का सामना करना पड़ता है और सवाल उठाना सामाजिक विवेक का महत्वपूर्ण पहलू बन जाता है. इसलिए वैज्ञानिक प्रवृत्ति की अवधारणा मानवता, समानता, अधिकार और न्याय की आधुनिक अवधारणाओं से जुड़ी हुई है. ज्ञानिक प्रवृत्ति को बढ़ावा देना किसी भी देश का प्रमुख दायित्व है. इसके लिए विभिन्न मोर्चों पर काम करने की जरूरत है. इसमें सबसे पहले सरकारी फ़ंड से प्राथमिक और उच्च शिक्षा का विस्तार करना है जिससे न कि सिर्फ़ अमीरों को बल्कि समाज के सभी वर्गों को गुणवत्ता वाली शिक्षा मिल सके.
इसमें विज्ञान और सामाजिक विज्ञान की शिक्षा के साथ-साथ तकनीकी प्रशिक्षिण पर ध्यान केंद्रित करना भी शामिल है जिससे प्राकृतिक, भौतिक और सामाजिक दुनिया की आलोचनात्मक समझ को बढ़ावा मिल सके.
देश में ऐसे कार्यक्रम चलाए जाने चाहिए जिनसे लोगों में सवाल उठाने की क्षमता और अलोचनात्मक विवेक पैदा हो सके. ज्ञानिक प्रवृत्ति को बढ़ावा देना किसी भी देश का प्रमुख दायित्व है. इसके लिए विभिन्न मोर्चों पर काम करने की जरूरत है. इसमें सबसे पहले सरकारी फ़ंड से प्राथमिक और उच्च शिक्षा का विस्तार करना है जिससे न कि सिर्फ़ अमीरों को बल्कि समाज के सभी वर्गों को गुणवत्ता वाली शिक्षा मिल सके.
इसमें विज्ञान और सामाजिक विज्ञान की शिक्षा के साथ-साथ तकनीकी प्रशिक्षिण पर ध्यान केंद्रित करना भी शामिल है जिससे प्राकृतिक, भौतिक और सामाजिक दुनिया की आलोचनात्मक समझ को बढ़ावा मिल सके.
देश में ऐसे कार्यक्रम चलाए जाने चाहिए जिनसे लोगों में सवाल उठाने की क्षमता और अलोचनात्मक विवेक पैदा हो सके. ज्ञानिक प्रवृत्ति को बढ़ावा देना किसी भी देश का प्रमुख दायित्व है. इसके लिए विभिन्न मोर्चों पर काम करने की जरूरत है. इसमें सबसे पहले सरकारी फ़ंड से प्राथमिक और उच्च शिक्षा का विस्तार करना है जिससे न कि सिर्फ़ अमीरों को बल्कि समाज के सभी वर्गों को गुणवत्ता वाली शिक्षा मिल सके.
इसमें विज्ञान और सामाजिक विज्ञान की शिक्षा के साथ-साथ तकनीकी प्रशिक्षिण पर ध्यान केंद्रित करना भी शामिल है जिससे प्राकृतिक, भौतिक और सामाजिक दुनिया की आलोचनात्मक समझ को बढ़ावा मिल सके.
देश में ऐसे कार्यक्रम चलाए जाने चाहिए जिनसे लोगों में सवाल उठाने की क्षमता और अलोचनात्मक विवेक पैदा हो सके.
इसमें लोगों को यौन स्वास्थ्य की शिक्षा देने वाले, जाति और धर्म से बाहर शादी को बढ़ावा देने वाले कार्यक्रम शामिल किए जा सकते हैं. साथ ही ऐसे सार्वजनिक कार्यक्रमों को प्रोत्साहन दें जो समानता और भाईचारे के आधुनिक मूल्यों को बढ़ावा देते हों और आधुनिक, लोकतांत्रिक और समावेशी सांस्कृतिक माहौल के विकास को संभव बनाते हों.
लेकिन, दुख की बात ये है कि मौजूदा स्थितियां इशारा करती हैं कि हम उल्टी दिशा में बढ़ रहे हैं.
उच्च शिक्षा के लिए फ़ंड घटाने, पंचगव्य जैसे छद्म-वैज्ञानिक कार्यों पर फ़ंड लगाने और सरकार में ज़िम्मेदार पदों पर बैठे लोगों की बयानबाज़ी विज्ञान और वैज्ञानिक प्रवृत्ति पर हमला करने से कम नहीं है.
हो सकता है कि ये थोड़े समय के लिए संकुचित हितों का पोषण कर दें लेकिन लंबे समय में इसके दुष्परिणाम भुगतने पड़ते हैं.

Wednesday, September 5, 2018

अफ़्रीकी देशों में चीन को लेकर क्यों बढ़ रहा है 'डर'

अफ़्रीकी देश चीन से मिलने वाले क़र्ज़ को लेकर काफ़ी उत्साह दिखा रहे हैं, लेकिन कुछ विशेषज्ञों ने इस महाद्वीप पर बढ़ते क़र्ज़ के बोझ को लेकर चिंता जताई है.
इन विशेषज्ञों का कहना है कि जल्द ही इसकी हक़ीक़त सामने आ सकती है.
युगांडा के लोगों के लिए अब भी एंतेबे-कंपाला एक्सप्रेस-वे आकर्षण का केंद्र बना हुआ है जबकि इसे खुले तीन महीने हो गए हैं.
यह 51 किलोमीटर का फ़ोर लेन हाइवे है जो देश की राजधानी को एंतेबे इंटरनेशनल एयरपोर्ट से जोड़ता है. इसे चीनी कंपनी ने 47.6 करोड़ डॉलर में बनाया है और पूरी रक़म को चीन के एग्ज़िम बैंक ने क़र्ज़ के रूप में दिया है.
अफ़्रीका के सबसे बुरे ट्रैफ़िक में शुमार 51 किलोमीटर की इसी दूरी को तय करने में पहले पसीने छूट जाते थे और दो घंटे का वक़्त लगता था. अब पूर्वी अफ़्रीकी देश युगांडा की राजधानी से एंतेबे एयरपोर्ट जाने में महज 45 मिनट का वक़्त लगेगा.
युगांडा ने तीन अरब डॉलर का चीनी क़र्ज़ लिया है. कंपाला स्थित अर्थशास्त्री रामादान जीगूबी का कहना है कि अफ़्रीका में बिना शर्त पूंजी लेने की ग़ज़ब की चाहत दिख रही है.
मेकरेरे यूनिवर्सिटी बिज़नेस स्कूल के एक लेक्चरर ने बीबीसी से कहा, ''यह क़र्ज़ चीन से आ रहा है और साथ में चीनी कंपनियों का बड़ा कारोबार भी आ रहा है. ख़ासकर चीन की कंस्ट्रक्शन कंपनियां पूरे अफ़्रीका में रेल, रोड, पनबिजली के बांध, स्टेडियम और व्यावसायिक इमारतें बना रही हैं.''
अफ़्रीकी देश जिस तरह से चीन से क़र्ज़ ले रहे हैं उससे उनके नहीं चुका पाने का ख़तरा भी बढ़ता जा रहा है. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने अप्रैल में कहा था कि इस इलाक़े में कम आय वाले 40 फ़ीसदी देश क़र्ज़ के बोझ तले दबे हुए हैं या इसके बेहद क़रीब हैं.
चाड, इरिट्रिया, मोज़ाम्बिक, कांगो रिपब्लिक, दक्षिणी सूडान और ज़िम्बॉब्वे के बारे में कहा जा रहा है कि ये देश क़र्ज़ के बोझ तले दबे हुए हैं.
ये देश 2017 के आख़िर में ही इस श्रेणी में आ गए थे. ज़ाम्बिया और इथियोपिया के बारे में कहा जा रहा है कि ये भी क़र्ज़ के जाल में फँसने के क़रीब हैं.
स्टैंडर्ड बैंक ऑफ़ चाइना के अर्थशास्त्री जर्मी स्टीवन्स ने एक नोट में लिखा है, ''केवल 2017 में अफ़्रीका में चीनी कंपनियों ने 76.5 अरब डॉलर की परियोजनाओं पर हस्ताक्षर किए हैं.''
जर्मी स्टीवन्स का कहना है, ''अफ़्रीका की सरकारें आधारभूत ढांचे के निर्माण में काफ़ी कम खर्च कर रही हैं. इसकी एक वजह तो ये है कि लागत ज़्यादा है और पैसे का पर्याप्त अभाव है. ऐसे में आशंका बढ़ रही है कि ये देश क़र्ज़ हासिल करने की योग्यता ना खो दें.''
अफ़्रीका में चीनी कंपनियों की वकालत करने वाले कई हाई प्रोफ़ाइल लोग हैं. इसमें अफ़्रीकी डिवेलपमेंट बैंक (एडीबी) के प्रमुख अकिनवुमी अडेसिना और नाइजीरिया के पूर्व कृषि मंत्री भी शामिल हैं. इन्होंने बीबीसी से कहा, ''बड़ी संख्या में लोग चीन को लेकर डरे हुए हैं, लेकिन मैं नहीं हूं. मेरा मानना है कि चीन अफ़्रीका का दोस्त है.''
चीन अफ़्रीका के आधारभूत ढांचे में बड़ा द्विपक्षीय निवेशक के तौर पर उभरा है. चीन जिस आकार में अफ़्रीका में पूंजी लगा रहा है उस कसौटी पर एडीबी, यूरोपियन कमीशन, द यूरोपियन इन्वेस्टमेंट बैंक, द इंटरनेशनल फ़ाइनेंस कॉरपोरेशन, वर्ल्ड बैंक और जी-8 के देश भी पीछे छूट गए हैं.
चीनी पैसे का असर भी पूरे अफ़्रीका में स्पष्ट तौर पर दिख रहा है. चमकते नए हवाई अड्डे, नई सड़कें, बंदरगाह और ऊंची इमारतें ख़ूब बन रहे हैं और इन सबसे नौकरियां भी पैदा हो रही हैं.
मैकेंजी एंड कंपनी की रिपोर्ट के अनुसार 2012 के बाद अफ़्रीका पर क़र्ज़ की रक़म तीन गुनी हो गई है. 2015-16 में तो केवल अंगोला पर ही 19 अरब डॉलर का क़र्ज़ हो गया था. अंगोला और ज़ाम्बिया अफ़्रीका में चीन के सबसे असंतुलित साझेदार हैं.
मैकेंजी एंड कंपनी का कहना है, ''अंगोला को देखा जाए तो वहां की सरकार चीनी निवेश और परियोजनाओं के बदले तेल की आपूर्ति करती है, लेकिन बाज़ार प्रेरित चीन की निजी कंपनियों के लिए बाक़ी के अफ़्रीकी देशों में इस तरह के सीमित विकल्प हैं.''
घाना के इन्वेस्टमेंट एनलिस्ट माइकल कोटोह का कहना है कि अफ़्रीका ने चीन के साथ मिलकर व्यापार, निवेश और वित्तीय प्रबंधन पर व्यापक समझौते किए हैं.
माइकल कहते हैं, ''अगर ऐतिहासिक रूप से अफ़्रीका में पश्चिमी देशों के कारोबार से तुलना करें तो चीन के साथ अफ़्रीका के जो समझौते हैं या जो परियोजनाएं चल रही हैं वो पारस्परिक फ़ायदे के हैं.''
हालांकि इस बात को हर कोई जानता है कि चीन के दोनों हाथों में लड्डू है. ऐसा इसलिए कि चीन ने जो समझौते किए हैं उनमें अपने हितों का ख़्याल पूरी बारीकी से रखा है.
मैकेंजी का अनुमान है कि 2025 तक चीन का अफ़्रीका में राजस्व 440 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है. यहां तक कि इस बात से अडसिना भी सहमत हैं.
वो कहते हैं, ''समझौते एकतरफ़ा हैं. आप किसी देश को खनन का अधिकार इसलिए दे रहे हैं कि आप सुपरहाइवे बनाना चाहते हैं. आप केवल एक देश से समझौते कर रहे हैं. ऐसे में कैसे दावा किया जा सकता है कि यह बेहतरीन समझौता है?''
अमरीका की तरह चीन में फ़ॉरेन करप्ट प्रैक्टिस जैसा कोई क़ानून नहीं है. अमरीका की तरह के क़ानून बाक़ी के पश्चिमी देशों में हैं जिनके तहत अनुबंध को हासिल करने में अगर रिश्वत दी जाती है तो कार्रवाई होती है.
हालांकि नोबेल सम्मान से सम्मानित अर्थशास्त्री जोसेफ़ स्टिग्लिट्ज़ चीनी निवेश पर पश्चिमी देशों की आलोचना को 'अंगूर खट्टे हैं' की तर्ज पर देखते हैं.
वो भ्रष्टाचार की चिंता को स्वीकार करते हैं. वो कहते हैं, ''परियोजना चाहे चीन से आए या पश्चिम के देशों से, सबका मूल्यांकन लागत और फ़ायदे की कसौटी पर होना चाहिए.''
जीगूबी का कहना है कि चीनी निवेश से अफ़्रीका में पर्यावरण के जुड़ी चिंताएं भी काफ़ी अहम हैं. वो कहते है कि अफ़्रीका में नियामक संस्थानों की स्थिति बहुत ख़राब है, इसलिए किसी भी तरह की जवाबदेही तय नहीं हो पाती है.
2015 में जॉन हॉपकिन्स स्कूल ऑफ़ अडवांस्ड इंटरनेशनल स्टडीज़ में चाइना अफ़्रीका रिसर्च इनिशिएटिव ने चीनी निवेश को लेकर चेतावनी दी थी. इस रिसर्च का कहना है, ''संभव है कि अफ़्रीकी देश चीन का क़र्ज़ चुकाने में नाकाम रहें. ऐसा इसलिए क्योंकि वस्तुओं क़ीमत अस्थिर रहती है और अफ़्रीकी सरकारें इन परियोजनाओं से बहुत फ़ायदा भी नहीं उठा पाएंगी. चीन भले इस इलाक़े में सबसे ज़्यादा क़र्ज़ दे रहा है, लेकिन अफ़्रीकी देश अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से भी क़र्ज़ ले रहे हैं. ऐसे में इस मामले में केवल चीन पर ही उंगली नहीं उठाई जानी चाहिए.''
इसी हफ़्ते बीजिंग में चाइना अफ़्रीका कॉरपोरेशन की सातवीं बैठक होनी है. इससे पहले जोहान्सबर्ग में बैठक हुई थी और चीन ने 35 अरब डॉलर रिआयती विदेशी मदद के तौर पर देने का वादा किया था.
जीगूबी चाहते हैं कि चीन अफ़्रीका में इंस्टीट्यूशन की क्षमता के निर्माण में मदद करे. वो चाहते हैं स्पेशल इकनॉमिक ज़ोन और इंडस्ट्रीयल पार्क बने जिससे निर्यात को बढ़ावा मिले.
जिबुती ने पिछले महीने चीन निर्मित फ़्री ट्रेड ज़ोन का उद्घाटन किया था. चीन व्यापार के पुराने मार्गों को अपनी महत्वाकांक्षी योजना वन बेल्ट वन रोड के तहत ज़िंदा कर रहा है.
इन सबके बावजूद अफ़्रीका में एक डर को पर्याप्त तवज्जो मिल रही है कि कहीं क़र्ज़ का बोझ इतना न बढ़ जाए कि निकलने का कोई रास्त ही ना बचे.