Friday, August 17, 2018

बुंदेलखंड: यहाँ गाय बन गई है किसानों के लिए आफ़त

अगस्त के दूसरे हफ़्ते में बांदा के नरैनी ब्लॉक के कालिंजर निवासी दादू और प्रदीप कुमार की 'अन्ना पशुओं' को बचाने के चक्कर में जान चली गई.
कालिंजर थाने के कोतवाल राकेश सरोज बताते हैं कि वे दोनों नरैनी सीएचसी से बाइक से गांव जा रहे थे.
"कालिंजर रोड पर शंकर का पुरवा गांव के पास अन्ना पशुओं को बचाने के लिए दाएं तरफ मुड़े तभी पीछे से आ रही बस ने टक्कर मार दी. दोनों की मौके पर ही मौत हो गई."
"अन्ना पशुओं के कारण आए दिन हादसे होते रहते हैं. लाश का पोस्टमार्टम करा कर घर वालों को सौंप दिया गया."
बुंदेलखंड में कई किसान पशुओं को पास के जंगल में छोड़ आते हैं, इन पशुओं को 'अन्ना पशु' कहा जाता है.
कुछ ऐसी की कहानी रामबख़्श के परिवार की भी है. इसी साल पहली जनवरी की तारीख थी.
झांसी ज़िले के मउरानीपुर ब्लॉक के धवाकर गाँव के रहने वाले 64 साल के रामबख़्श यादव कड़ाके की ठंड में खेत में काम कर रहे थे.
तभी अन्ना पशुओं के एक झुँड ने फसलों पर धावा बोल दिया. फसल बचाने के लिए रामबख़्श पशुओं को भगाने लगे और अन्ना पशुओं ने रामबख़्श पर हमला कर दिया.
घायल रामबख़्श की अस्पताल पहुँचने से पहले ही मौत हो गई. रामबख़्श की पत्नी और 3 बच्चे आज भी उस घटना को याद करके सहम जाते हैं.
इस घटना को लेकर काफ़ी विरोध प्रदर्शन हुए. राज्य सरकार ने माना कि रामबख़्श की मौत अन्ना पशुओं के कारण हुई. सरकार ने उनके परिवार को मुआवज़ा भी दिया.
बुंदेलखंड में आए दिन ऐसी घटनाएँ अख़बारों की सुर्खियाँ बनती हैं. किसानों के लिए अन्ना पशु अब आफ़त बनते जा रहे हैं. बुंदेलखंड में लाखों की संख्या में अन्ना पशु हैं.
ये फसलों को बर्बाद कर देते हैं. सड़कों पर आकर दुर्घटनाओं का कारण बनते हैं.
बुंदेलखंड के किसान नेता शिव नारायण सिंह परिहार कहते हैं कि बुन्देलखंड में 'अन्ना प्रथा' अब किसी आफ़त से कम नहीं रह गई है.
वो कहते हैं, "झांसी-कानपुर नेशनल हाइवे, झांसी-इलाहाबाद नेशनल हाइवे, झांसी-शिवपुरी नेशनल हाइवे पर आए दिन अन्ना पशुओं के कारण दुर्घटनाएं होती रहती हैं."
अन्ना पशुओं के कारण किसानों के बीच लड़ाई-झगड़े भी यहां आम बात है.
अन्ना प्रथा कैसे शुरू हुई इस बारे में महोबा के ककरबई के किसान राजेंद्र कुमार बताते हैं कि पहले हमारे गाँव से लगा हुआ एक छोटा सा जंगल था.
"आसपास के जितने भी गाँववाले थे, वो सभी इसी जंगल में पशुओं को छोड़ जाते थे. अब जंगल ख़त्म हो चुके हैं लेकिन किसानों की आदत नहीं छूटी है."
"हालत ये है कि किसान आज भी पशुओं को खुला छोड़ देते हैं और यह पशु खेतों में खड़ी फसलों को बर्बाद करते हैं."
झांसी के मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी डॉक्टर वाईएस तोमर की मानें तो बुंदेलखंड के सूखे और पलायन की समस्या ने यहाँ अन्ना प्रथा को जन्म दिया है.
तोमर कहते हैं, "ये प्रथा कई वर्षों से चली आ रही है. इस प्रथा में गाय, बैल व भैंस आदि जानवरों को भोजन की तलाश के लिए खुला छोड़ दिया जाता है."
"किसान जानवरों को बचपन से ही इसकी आदत डाल देते हैं."
बड़ागाँव के किसान रामचंद्र शुक्ल बताते हैं, "जब चैत्र के महीने में फसल कटने के बाद खेत खाली हो जाते थे, उस समय जानवरों को खुला छोड़ दिया जाता था."
"ये खेतों में बची फसलों को साफ़ कर देते थे."
वाईएस तोमर इसकी वजह सूखा, चारागाह की कमी को बताते हैं, "न ही जानवर दूध ज़्यादा देते हैं. इसलिए भी किसान जानवरों को छोड़ देते हैं."
जालौन के संजय सिंह कहते हैं कि इसके पीछे किसानों का 'कृषि ज्ञान' काम करता था.
"खुले खेतों में इन जानवरों के विचरण करने और चरने से उन्हें अपने खेत की उर्वरा शक्ति बढ़ाने में भी मदद मिलती थी."
"खेत में इन जानवरों का गोमूत्र और गोबर खाद का काम करता था. लेकिन, सूखे व पलायन के कारण हालात बदल गए हैं."

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